वाराणसी

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काशी या वाराणसी भगवान शिव की राजधानी है इसलिए अत्यंन्त महिमामयी भी है। अविमुक्त क्षेत्र, गौरीमुख, त्रिकण्टिकविराजित, महाश्मशान तथा आनन्दतवन प्रभृति नामों से मण्डित होकर गूढ आध्यात्मिक रहस्यों वाली भी है।

आज की वाराणसी को ही काशी या वाराणसी इन दोनों नामों से जाना जाता है। वाराणसी शब्द का ही अपभ्रंश नाम बनारस भी है। आज भले ही वाराणसी या काशी या बनारस कहने पर एक ही नगर का स्वरूप सामने आता है लेकिन इतिहास का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में ऐसा नहीं था। अनुमानत: दसवीं शताब्दी ई0 के आसपास, काशी और वाराणसी में अभिन्नता मानकर दोनों को एक कहने, समझने का क्रम चल पड़ा।

भौगोलिक दृष्टि से वाराणसी की स्थिति अक्षांश 25.18 उत्तदर देशांतर 83.1 पर है समुद्रतल से इसकी उचॉई 252 फुट है। गंगा के किनारे यह अर्धचन्द्रा कार रूप से अवस्थित है।

काशी क्षेत्र के अन्तेर्गत ही क्षेत्रविशेष का सीमांकन करते हुए उसे वाराणसी क्षेत्र का नाम दिया गया। यह सीमांकन पूर्णत: धार्मिक एवं आध्यात्मिक था। इस प्रकार काशी क्षेत्र का विस्तार वाराणसी क्षेत्र से अधिक था, जिसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। प्राचीन भारतीय राजनैतिक व्यवस्था भी इस तथ्य का समर्थन करती है। तदनुसार षोडश महाजनपदों में एक काशी का भी स्थान है। धार्मिक दृष्टि से काशी के चार विभाग किए गए थे और जो कि आज भी है। इनके नाम है। 1- काशीक्षेत्र 2- वाराणसी क्षेत्र 3- अविमुक्त क्षेत्र एवं 4- अन्तर्गृह । इनका संक्षिप्त परिचय जान लेना उपयोगी होगा-