श्री विश्वनाथ दर्शनविधान



विभिन्न पुराणों तथा अन्य निबन्धहग्रन्थों में श्री विश्वेश्वर के दर्शन का विधान एवं क्रम वर्णित है जो कि विश्वनाथ जी के उन प्राचीन मन्दिरों और परिसरों के अनुसार है जिनके अस्तित्व का अब पता नहीं चलता। वर्तमान मन्दिर में उन देवताओं तथा तीर्थों का स्मरण करते हुए प्रवेश करके दर्शन की परम्परा बन गई है। जन सामान्य की सुविधा के लिए इस क्रम-विधान का वर्णन यहाँ किया जा रहा है।

आदौ देव्यां: मण्ड‍पं सम्र्प्रविश्य तत्र स्थित्वा पूजयेद्वै भवानीम्।
श्रीमदभवानीसदनं समाप्य प्रदक्षिणीकृत्य तथाष्टयवारम्।।

ततो ढुण्ढिं गत्वा मधुरततरनैवेद्यविभवै-
रूपास्य् स्तुत्वा तं विविधभयविध्यानिदशमनम्।

गच्छे्त्ततो विश्वपति महानति: प्रदक्षिणीकृत्य सुतारतीर्थे।
स्नात्वा ततो दण्डपतिं प्रणभ्य सम्पू्ज्य निर्वाणगतं तु पंचकम्।
                                 (ब्र०वै०पु, का०र०,16/1-12)

सचैलमादौ संस्नाय चक्रपुष्किरिणीजले।
संतर्प्य देवाज् सपितृन ब्राह्मणाश्च तथार्थिन:।।
आदित्यं द्रौपदीं विष्णुं दण्डपाणिं महेश्वरम्।
नमस्कृत्य ततो गच्छेद् द्रष्टुं ढुण्ढिविनायकम्।।
ज्ञानवापीमुपस्पृ्श्य नन्दिकेश ततोर्चयेत्।
तारकेश ततोमर्च्य् महाकालेश्वरं तत:।।
तत: पुनर्दण्डपाणिमित्येषा पंचमतीर्थिका।
दैनन्दिना विधातव्या महाफलमभीप्सु‍भि:।।
ततो वैश्वेवश्वरी यात्रा कार्या सर्वर्थसिद्धदा।
                                 (का०खं०,त्रि० से०प्र०214)

सर्वप्रथम वस्त्र सहित चक्रपुष्करणी (मणिकर्णिका कुण्ड अथवा घाट) में स्नान कर देवताओं, पितरों का तर्पण करके ब्राह्मणों और याचकों को भी संतुष्ट करें। तदुनन्तर आदित्य, द्रौपदी, विष्णु, दण्डपाणि तथा महेश्वर को प्रणाम करके ढुंढिराज गणेश के दर्शन को जायें। उसके बाद ज्ञानवापी के जल का स्पर्श करके वहीं पर नन्दिकेश्वर की अर्चना करें। तदन्तशर तारकेश्वर और महाकालेश्वर की अर्चना करके पुन: दण्डपाणि के दर्शन को जायें तब विश्वेश्वर का दर्शन करें।