श्री विश्वनाथ



काशी या वाराणसी भगवान शिव की राजधानी है इसलिए अत्यन्त महिमामयी भी है। अविमुक्तक्षेत्र, गौरीमुख, त्रिकण्टकविराजित, महाश्मशान तथा आनन्दवन प्रभृति नामों से मण्डित होकर गूढ आध्यात्मिक रहस्यों वाली भी है। श्री शिव यहाँ विराजमान हैं और उनकी महत्ता के कारण उन्हें ही विश्वेश्वर या विश्वेश या विश्वनाथ कहा जाता है। ये ही देवाधिदेव महादेव हैं जिनका आदि-अन्त अप्रमेय है। अत: ज्ञानी भक्त इनके जिस रूप को जान समझ पाते हैं उसी रूप में इनकी पूजा करते हैं। काशी सर्वतीर्थमयी है। काशीपति विश्वनाथ हैं। आदिशंकराचार्यजी कहते हैं –

शम्भो महेश करुणामय! शूलपाणे गौरीपते! पशुपते! पशुपाशनाशिन्।
काशीपते! करूणया जगदेतदेकस्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।।

त्व्त्तो् जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिंगात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्।। />
                                 (शंकराचार्यकृत वेदसारशिवस्तोत्र – 10, 11)

श्रुतिस्मृ्ति इतिहास तथा पुराणादि के अनुसार काशी सकल ब्रह्माण्ड के देवताओं की निवासस्थली है और यह स्थल शिव को तो अत्यन्त प्रिय है। इसी से उनके अनेकानेक रूप विग्रह, लिंग आदि की अर्चना होती रही है। श्रीकाशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग सर्वविध अभ्युदय तथा नि:श्रेयस् का कारक है जैसा कि कहा भी गया है-

काशीविश्वेश्वरं लिंगं ज्योयतिर्लिंगं तदुच्‍यते।
तद्दष्ट्वा परमं ज्योतिराप्नोति मनुजोत्तम:।।
                                               (ना0पु0, त्रि0से0 पृ 187)

अर्थात् काशी में देवाधिदेव विश्वनाथ जी का पूजन अर्चन, सर्व पाप नाशक, अनन्त् अभ्युदयकारक, संसाररूपीदावाग्नि से दग्ध जीवरूपी वृक्ष के लिए अमृत तथा भवसागर में पड़े प्राणियों के लिए मोक्षदायक है।

काश्यां श्रीदेवदेवस्य विश्व्नाथस्यपूजनम्।
सर्वपापरह: पुंसामनन्ताभ्युदयावहम्।।
संसारदावनिर्दग्धजीवभूरूहजीवनम्।
दु:रवार्णवौघपतितप्राणिनिर्वाणकारणम्।।
                                        (शिवपुरा0त्रि0से0 पृ188)

विश्वेश्वरज्योतिर्लिग की यह विशेषता है कि इसके दर्शन मात्र से मनुष्य का अज्ञान दूर हो जाता है। यह अत्यन्‍त महत्वपूर्ण तथा सर्वफलदायक है-

लिंग महानन्दकरं विश्वेशाख्यं सनातनम्।
नमस्कृत्य विमृच्येत पुरूष: प्राकृतै: गुणै:।।
                                 (ब्र0वै0पु0, त्रि0से0पृ0 183)

सर्वलिंगार्चनात्पु्ण्यं यावज्जन्म यदर्च्यते।
सकृद्विश्वेशमभ्यर्च्य श्रद्धया तदवाप्यते।।
यज्ज्न्मनां सहस्रेण निर्मलं पुण्यमर्चितम्।
तत्पुवण्येपरिवर्तेन भवेद्विश्वस्य दर्शनम्।।
गवां कोटिप्रदानेन सम्ययक्दत्तेन यत्फलम्।
तत्फलं समयगाप्येत् विश्वेफश्वलरविलोकनात्।।
                                 (का0ख0,त्रि0से0, पृ0 184)

भगवान शिव ने इस ज्योतिर्लिंग को स्वयं के निवास से प्रकाशपूर्ण कहा है-

अहं सर्वेषु लिंगेषु तिष्ठाम्येव न संशय:।
परं त्वियं परामूर्तिर्मम लिंगस्वरूपिणी।।
                                 (का0ख0 99/20)