श्री शिवतत्व

शिव शब्द के चार प्रसिद्ध अर्थ है। (1) माया से तटस्थम अर्थात् निर्विशेष ब्रह्म (2) श्रीविष्णु तत्व (3)श्रीशम्भुतत्व तथा (4) मंगल। वस्तुत: शिवतत्व अत्यन्त निगूढ है और इसे समझ पाना भी अतिकठिन है। तद्यपि श्वेताश्वतरोपनिषद् के इस मंत्र से यह कठिनाई कुछ सरल हो जाती है–

सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।
सर्वव्यापी स भगवॉस्त्त: सर्वगत: शिव:।।

अर्थात् वह भगवान समस्त मुखोंवाला, समस्तशिरों वाला तथा समस्तर ग्रीवाओं वाला है। यह सभी भूति (प्राणियों) के अन्त:करणों में रहने वाला और सर्वव्यापी है इसीलिए वह सर्वगत और मंगलरूप भी है।

संसारचक्र के लीला अभिनय में यह परमोदार सदाशिव, सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुचरुष तथा ईशान रूप में क्रमश: जगत् की सृष्टि, स्थिति, प्रलय, निग्रह तथा अनुग्रह रूप में कार्य करते हैं। इनमें से पहले तीन कृत्य तो समष्टि की दृष्टि से जाने जाते हैं। बाद के दो कृत्य। व्यष्टिरूप से जगत् में प्रसिद्ध हैं और होते रहते हैं। इसे भगवान् शिव के असंख्य दिव्य चरित्रों के रूप में जाना जाता है। जैसे त्रिपुरदाह, अन्धभकविजय, यज्ञविध्वंस, मदनदहन, हरिहरैक्य, अर्धनारीश्वर, शरभलीला, किरातलीला, सहजवरदान आदि आदि। शिव इतने करुणामय हैं कि अपने भक्तों के लिए अनेक रूपों में प्रकट हो जाते हैं। पूजा अर्चना से भी ये ज्योतिर्लिंग,बाणलिंग आदि रूपों से जीवों पर अनुग्रह करते ही हैं। इसी से इनके अनेक रूप हैं श्री विग्रह, अष्टमूर्ति, ज्योतिर्लिंग, स्वयंभूलिंग, अर्धनारीश्वर आदि। वेद, पुराणादि में इनके अनेक रूपों का वर्णन किया गया है जिससे इनकी शक्ति, महिमा आदि का बोध होता है।

दिगम्बरता

भगवान् समष्टि व्यष्टि, देहत्रयरूप प्रपंच के विधि निषेधों से अतीत हैं। इसी कारण इन्हें दिगम्बर कहा जाता है। भगवान शिव के स्वरुप की कल्पना निम्नलिखित उद्धरण की जा सकती है

निरावरणविज्ञानस्वरूपो हि स्वोयं हर:।
स्वैरं चरति संसारे तेन प्रोक्तो दिगम्बर:।।

भस्मोद्धूलन

ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मभसात् कुरूते किल।
तेनैव भस्मना गात्रमुद्धूलयति धूर्जटि:।।
भासते भ्न्निभावानामपि भेदो न भस्मनि।
स्वस्वभावस्व्भावेन भस्म भर्गस्य वल्लभम्।।

जटाजूट

विश्रामोऽयं मुनीन्द्राभणां पुरातनवटो हर:।
वेदान्तसांख्य्योगाख्यास्तिस्रस्ज् टय: स्मृता:।।

त्रिनेत्रता

आप्यायनस्तमोहन्ता विद्यया दोषदाहकृत्।
सोमसूयर्यागिननयनस्त्रिनेत्रस्तेन शंकर:।।

सर्पभूषणता

योगिन: पवनाहारास्तथा गिरिबिलेशया:।
निजरूपे धृतास्तेन भुजंगाभरणो हर:।।

त्रिशूल

शान्तिवैराग्य्बोधाख्यैुस्त्रिभिरग्रैतरस्विभि:।
त्रिगुणं त्रिपुरं हन्ति त्रिशूलेन त्रिलोचन:।।

वृषभवाहन

ब्रह्माद्या यत्र नारूढास्ततमारोहति शंकर:।
समाधिं धर्ममेघाख्यंन तेनायं वृषवाहन:।।

श्मशान

नित्यं क्रीडति यत्रायं स्वयं संसारभैरव:।
तत्र श्म‍शाने संसारे शिव: सर्वत्र दृश्यते।।

गण

आनन्दसागर: शम्भुवस्तच्छक्तिद्रव उच्यते।