पंचक्रोशी यात्रा



काशी की सभी धार्मिक यात्राओं में पंचक्रोशी यात्रा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार अन्यत्र किए गए पापों का नाश काशी में हो जाता है, किन्तु काशी में किए गए पापों का नाश पंचक्रोशी यात्रा से होता है। वर्ष में दो बार अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन में एक-एक बार इस यात्रा को करने का विधान है-

अन्लक्षेत्रे कृतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति।
पुण्येक्षेत्रे कृतं पापं वाराणस्यां विनश्यति।।
वाराणस्यां कृतं पापं अन्तरर्गेहे विनश्यति।
अन्तणर्गेहे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।
वज्रलेपच्छिदे ह्येतत् पंचक्रोशप्रदक्षिणम्।।
                                               (11/17-19)

इस यात्रा को एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन या सात दिन में पूरा करने का विधान है। लेकिन आजकल प्राय: पाँच दिनों में यह यात्रा श्रद्धालुओं द्वारा करने की परम्परा बन गई है। अनेक उत्साही शिवभक्त इसे एक ही दिन-विशेषत: महाशिवरात्रि को पूरा करते हैं। काशी रहस्य् के अनुसार इस यात्रा के लिए आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ, फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाख मास प्रशस्त कहे गए हैं। किन्तु श्रद्धावश इसे कभी भी किया जा सकता है-

यथाकथचिंद् देवेशि़! पंचक्रोशप्रदक्षिणम्।
कुर्यादेव न मासादि चिन्तयेद्धर्मकोविद:।।
स एव शुभद: कालो यस्मिंच्छेद्धोदयो भवेत्।।
                                               (10/84,85)

इस यात्रा का आरम्भ गंगास्नान, ज्ञानवापी में यात्रासंकल्प , ढुण्ढिराज गणेश का दर्शन तदनन्तर श्री विश्व नाथ जी का दर्शनपूजन करके मणिकर्णिकास्नान और वहीं सिद्धिविनायक का पूजन करके होता है। प्रथम दिन कर्दमेश्वर,द्वितीय दिन भीमचण्डी तृतीय दिन रामेश्वर तथा चतुर्थ दिन कपिलधारा में रात्रिविश्राम करने का विधान है।