मन्दिर परिसर



1676 ई0 में क्रमश: रीवॉ नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी यात्रा पर आये और विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित किया। इन्हें आज भी गर्भगृह के दोनों ओर देखा जा सकता है। इस प्रकार 1680 ई0 से लगभग सौ वर्षों तक विश्वनाथ जी की पूजा संकुचित सीमित रूप में ही होती रही। वर्तमान मन्दिर का स्व्रुप और परिसर 2008 ई0 तक वैसा ही रहा जैसा कि महारानी अहिल्याबाई द्वारा सन् 1780 ई0 में बनवाया गया होगा। सम्प्रति शासन द्वारा मन्दिर परिसर का विस्तार किया जा रहा है।