काशी से शिव का सम्बन्ध

कहा जाता है कि जब भगवान शिव मन्दरपर्वत से काशी आए तभी से उत्त्म देवस्थान नदियों, वनों, पर्वतों, तीर्थो तथा द्वीपों आदि सहित काशी पहुंच लिए-

यदा प्रभति विश्वेशो मन्दारादागतोऽभवत्।
तस्मिन्नान्दगहने तदा प्रभृति सत्त्म।।
सर्वाण्यायतनान्याशु साधूनि सगिरीण्यपि।
सनदीनि सतीर्थानि सद्वीपानि ययुस्तत:।।
                        (काशीखण्ड,, वा0वै0 245)

भगवान् शिव का कथन है कि पृथ्वी पर जितने भी मेरे स्थान हैं वे सभी वाराणसी में भी मेरे सान्निध्य् में रहते हैं इसका प्रमाण है -

यानि चान्या्नि पुण्यानि स्थानानि मम भूतले।
तानि सर्वाण्यनेकानि काशीपुर्या विशन्ति माम्।।
                                    (स्कन्द0)
ततो वाराणसीं गत्वा देवमर्च्य वृषध्व्जम्।
कपिलाह्रदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत्।।

वाराणसी में भगवान् शिव की अर्चना से और कपिला सरोवर में स्नान से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।

तत्रसाक्षान्महादेवो देहान्तेऔ स्वयमीश्वर:।
व्याचष्टे। तारकं ब्रह्म तथैवैकं विमुक्तिदम्।।
यत्तत्परतरं तत्त्वमविमुक्तमिति स्मृतम्।।
एकेन जन्माना देवि। वाराणस्थां तथाप्नुयात्।।
                        (कूर्मपुराण 1/31 60, 62)

वाराणसी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। अविमुक्त ही परात्पर तत्व कहा गया है जो कि काशी में एक ही जन्म में मिल जाता है। यही अभिप्राय इस श्लोक से भी प्रकट होता है।

यत्रविश्वश्वंरो देवो देव: सर्वेषामेव देहिनाम्।
ददाति तारकं ज्ञानं संसारान्मोचकं परम् ।।


                        (त्रिस्थलीसेतु पृ0 308)

कहते हैं कि वाराणसी या काशी ये केवल नाम भर ही नहीं हैं अपितु ये वे महामंत्र हैं जिनके त्रिकाल स्मरण से ही मनुष्य पुर्नजन्म के चक्र से छूट जाता है। जिस प्रकार विष्णु या शिव के नाम जप से लोक अपने शोक का विनाश कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है वैसे ही वाराणसी के भी नामजप से मृत्यु बन्धन को पारकर मृत्युतजेता हो जाता है। क्योंकि वाराणसी या काशी में रुद्र साक्षात् बसते हैं और जहॉ शिव रहते हों वहाँ यम भय कैसा?

वाराणसीति काशीति महामन्त्रमिमं जपन्।
यावज्जीवं त्रिसन्धय तु जन्तुजातुर्न जायते।। (स्क0)
यथा विष्णो: शंकरस्या‍पित नाम्न: लोक: शोकं नाश्य मोक्षं प्रयाति ।
वाराणस्या नाम गृह्णन्विशेषात् तीर्त्वा मृत्युं मृत्यु्जेता स्वयं स्या‍त्।।
वाराणसीति काशीति रूद्रावास इति स्फृटम्।
मुखाद्विनिर्गतं येषां तेषां न प्रभवेद्यम:।। (स्क0)

काशी में विश्वनाथ जी की पूजा अर्चना, उपासना, साकाम और निष्काम भाव से दोनों रूपों में अत्यवन्तू प्राचीनकाल से ही होती रही है। शिव के विविध रूपों का प्राकट्य काशी में हुआ है जिसका संकेत प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलता है। विश्वकल्याण के लिए भगवान शिव कैलाशवास छोड़कर काशी में नित्य निवास करते हैं। इसीलिए ही तो ये विश्वनाथ हैं। इसलिए इनकी अनेक छविहाँ बनती हैं। पुरुषाकार, शून्याकार या फिर निराकार भी। काशी में विश्‍वनाथ जी ऐसे विराजते हैं कि कहावत ही प्रसिद्ध हो गयी- ‘’काशी का कंकर शंकर’’। यह अतिशय श्रद्धा विश्वास के कारण भी हो सकता है किन्तु सच यह है कि काशी की भूमि ही इतनी कल्याणमयी है कि यहाँ सर्वत्र हर कण में शिव ही दिखते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि सकाम उपासना में कामना के अनुरूप ही देवता और उपासना स्थल चुने जाते हैं। तदनुसार उनके महत्व और प्राधान्य बनते बिगड़ते रहते हैं। उससे उनका पारमार्थिक लौकिक महत्व भी प्रभावित होता है। काशी का और विश्वनाथ आदि का किसी युग में किसी प्रकार का कभी, कोई महत्व कम हो गया हो ऐसा प्रमाण नहीं मिलता।