काशी क्षेत्र

विभिन्न पुराणों में काशी का विस्तृत वर्णन किया गया है। किन्तु उनमें यत्र तत्र काशीक्षेत्र के स्वपरूप में कुछ न कुछ भिन्नता भी है। जैसे कि पद्मपुराण के पातालखण्ड के प्राप्त     वर्णन के अनुसार मध्यमेश्वर के चारों ओर वृत्ताकारक्षेत्र काशी क्षेत्र है -

मध्यमेश्वरमारभ्‍य यावद्देहवध्नपम्।
सूत्रं संस्थाप्य तद्दिक्षु भ्रामयेन्मण्डलाकृतिम्।।
तत्र या जायते रेखा तन्म्ध्ये क्षेत्रमुत्तमम्।
काशीति यद्विदुर्देवस्तत्र मुक्ति: प्रतिष्ठिता।।

अर्थात्, मध्यमेश्वर को केन्द्र मानकर देहली विनायक तक सूत्र की कल्पना करके उसे सभी दिशाओ में घुमाने से जिस मण्डयल का निर्माण होगा वही मुक्ति भूमि काशी है। ब्रह्म पुराण के अनुसार -

वरणा चाप्यसिश्चैव द्वे नद्ये सुरवल्ल भे।
अन्त राले तयो: क्षेत्रं भूमावपि विशेषत:।।
पंचक्रोशप्रमाणं तु क्षेत्रं दत्तं मया तव।
क्षेत्र मध्येण यदा गंगा गमिष्येति सरित्पततिम्।।

 इस प्रकार काशी क्षेत्र का व्यावस 10 कोस निकलता है। इसके अन्तार्गत ही वाराणसी क्षेत्र की प्रधानता दी गई है -

गंगासीदेहलीविनायकवरणारूपैश्चयतुर्दिगवधि‍भिरवच्छिन्नो देशो वाराणसीति।

काशी के भौगोलिक स्वीरूप के सम्बान्धह में एक महत्ववपूर्ण तथ्यत ब्रह्मवैवर्तपुराण के काशीरहस्‍य की सेतुबन्धकटीका में मिलता है-

कृते त्रिशूलवद् ज्ञेयं त्रेतायां चक्रवत्तथा ।
द्वापरे तु रथाकारं शंखाकारं कलौयुगो।।
मुखं शंखस्य गंगायां पृष्ठं‍ देहलिसन्निधौ।
वामपार्श्वयस्थितं तोयं रामाख्यं वरणाभिधम्।।

काशी नाम के सम्बन्ध- में भी अनेक अनुमान लगाए जाते रहे हैं। मनु की बारहवीं पीढी़ में हुए राजा काश के द्वारा भी इस नगरी के बसाए जाने की बात कही जाती है, तथापि इस नगरी के बसने के मूल में कहीं-न-कहीं परमसत्ता की उपस्थिति अवश्य है-

काशतेऽत्र यतो ज्योतिस्तदनाख्येयमीश्वनर।
अतो नामा परं चास्तुप काशीति प्रथितं विभो।।