।।श्री काशीविश्वनाथो वियतेतराम्।।

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद।।
                (ऋग्वेद,मण्डल10, सूक्त129,मंत्र 7)

गंगातरंगरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरभूषितवामभागम्।
नारायणप्रियमनंगमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भजविश्वनाथम्।।

गंगतरंग की हारी छटा जिन बीच विराजत माथ जटा
गिरजा की छवि दमकत चमकत, वामांग तनु जिनके लिपटा।
श्रीहरि के प्रिय हैं प्रभु जो, जिनसे स्मरदेव का मान घटा
भज नित्य ही काशीपति हरनाम विश्वेश विशेष से फाँस कटा।।

भूमिष्ठाऽपि न याऽत्रभूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चैरध: स्थाऽपि या
या बद्धा भुवि मुक्तिदा स्युरमृतं यस्‍यां मृता जन्तव: ।
या नित्यं त्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरै सुरै: सेव्यते
सा काशी त्रिपुरारिराजनगरी पायादपायाज्ज्गत्।।

भाषत है जो धरा पर ही, पर है नहीं, नीची, द्युलोक से ऊँची
अवनी की मनी यह मुक्तिधनी, जँह मृत्यु भए अमरत्व बनी।
जँह तीनहुँ लोक की पूतकरी नदी गंगतटे सुरभीर घनी
रजधानी त्रिलोचन की काशी जगताप की वारण छत्र बनी ।।

काशी और यहाँ के देवायतनों का महत्वर सर्वकालिक रहा है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक यह आध्यात्मिक तथा विद्यानगरी होने के साथ-साथ सर्वतीर्थमयी तथा मोक्षदायिनी भी है। विश्व के प्राचीनतम ज्ञानभण्डार संस्कृत वाड.मय में काशी का और उसकी दिव्य विशेषताओं का निरन्तपर निरूपण और वर्णन होता रहा है। वस्तुत: काशी को जानने एवं समझने के लिए संस्कृत साहित्य एक प्रमुख प्रामाणिक आधार है। संस्कृत रचनाकारों- कवियों ने काशी का जिस प्रकार वर्णन किया है उससे यहाँ के सभी पक्ष आलोकित हो उठते हैं। अर्थात् यहाँ की सभ्यता-संस्कृति अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक आदि सभी पक्षों द्वारा मनुष्य को बनाती है।

पुराणादि के साथ साथ राजतरंगिणी, दशकुमारचरित आदि संस्कृत साहित्य की ऐसी अद्धितीय रचनाएं हैं जिनसे काशी का स्वर्णिम अतीत आलोकित हो उठता है।

आठवीं शती के कश्मीह के राजनयिक और कवि दामोदरगुप्त ने अपनी रचना ‘कुट्टनीमतम्द्’ में तो विश्वेश्वर और उनके आसपास के परिवेश तक की चर्चा की है जो कि एक जीवंत ऐतिहासिक छवि उपस्थित करता है। इसी प्रकार दशवीं शती के महाकवि श्रीहर्ष भी अपनी महान महाकाव्यतकृति ‘नैषधीयचरितम्द्’ में काशी की श्रेष्ठतम आध्यात्मिकता को दर्शाते हुए जब इसे पृथ्वी पर बसा हुआ नहीं स्वीकार करते तो उनका अभिप्राय इस नगरी को लोकोत्तर या अलौकिक सिद्ध करता है -

वाराणसी निविशते न वसुन्धरायां
तत्र स्थितिर्मखभुजां भुवने निवासी:।

अगणित वर्णनों से काशी और काशीपति का मानव समाज के सर्वविध उत्कर्ष में अपरिहार्य एवं अनिवार्य आवश्यकता संकेतित होती है। प्रलयकाल में भी इस नगरी के शाश्वत होने का विश्वास, ज्ञान विज्ञान से पूर्ण उन्नत आध्या‍त्मिक संस्कृति और प्राकृतिक समृध्दि ही इसे अतिविशिष्ट बनाती है। किन्तु काशी के प्रति सनातन धर्म के प्रति अविश्वसनीय भाव रखने वाले आधुनिक विद्वानों में मोक्ष की अवधारणा को लेकर संशय बना हुआ है किंतु पुराण और उसके अनुयायियों तथा काशी की महिमा के प्रति विश्वास भाव रखने वालों को तो काशी में मुक्ति मिलती ही है। इसका प्रमाण है ऐसे विशिष्ट पर्व दिन, मास जिनमें काशी में लाखों-लाख जन मुक्ति की कामना से काशी की यात्रा करते हैं। वैसे तो आज के समय में यह भीड़ प्रतिदिन देखी जा सकती है। फिर भी पुराणों के अनुसार भी मुक्ति देने वाली सभी पुरियों में काशी सर्वश्रेष्ठ है

अन्यानि मुक्तिक्षेत्राणि काशीप्राप्तिकराणि हि।
काशी प्राप्यय विमुच्यते नान्यथा तीर्थकारिभि:।।
काश्या: सर्वा नि:सृता: सृष्टिकाले
काश्यामन्त: स्थितिकाले वसन्ति।
काश्यां लीना: सर्वसंहारकाले
ज्ञातव्यास्ता: मुक्तपुर्यो भवन्ति।।

इस प्रकार काशी अन्य् छह मुक्तिदायिनी पुरियों की उत्पत्ति तथा लय स्थान भी है। देवताओं को भी इतनी प्रिय लगी कि इसकी पवित्रता दिव्‍यता से उन्हें यहाँ निवास करना प्री‍तिकर जान पड़ा । अनेकानेक तीर्थों ने भी यहाँ अपने-अपने स्थान बनाए तथा ऋषियों, तपस्वियों और साधकों ने भी परम तत्व की जिज्ञासा की शान्ति के लिए यहाँ साधना आराधना कर अपने लक्ष्य प्राप्त किए। काशी वेदव्यास की भी कर्मस्थाली बनी । उन्होंने काशी की महिमा रहस्य तथा महाम्‍य आदि से इतने अभिभूत हुए कि इसके वर्णन के लिए स्कंद पुराण में काशी खण्ड के नाम से एक खण्ड ही रच दिया। इसके अतिरिक्त भी पद्म, लिंग, ब्रह्रमवैवर्त आदि पुराणों में काशी का महिमानिरूपण वे करते रहे। वस्तुत: काशी समाज के समुचित दिशा-निर्देश के लिए एक ज्ञान केन्द्र था जो आज भी है, जहाँ कि अनेकानेक ग्रन्थों का लेखन, विद्वानों द्वारा श्रेष्ठ विचारों का प्रकाशन और उन पर गहन विमर्श समाज के उत्क्रर्ष के लिए सनातन काल से होता आया है। व्यक्ति से लेकर समाज तक के अभ्युदय और नि:श्रेयस के लिए जिस धर्म की अपेक्षा होती है उसकी व्या‍ख्या, उसके निरूपण के साथ की जाती रही है। यह सन्देश दिया गया कि ज्ञान विज्ञान के बिना मनुष्यजीवन की पूर्णता नहीं है। इन्ही से वह प्रेरित होकर अविचल भाव से नि:स्पृह होकर कर्ममार्ग में प्रवृत्त हो पाता है तथा प्राप्त फल का त्यावगभाव से अपने जीवन में भोग कर सन्तुष्‍ट होता है। अनासक्त भाव से भरी यह जीवनपद्धति‍ ही मनुष्य को मुक्ति पथ पर अग्रसर करती है। काशी में ऐसे ही जीवन का अनुपालन किया जाता रहा जो कि नित्य आनन्दमय ही हुआ करता था। आज भी काशीवासी ऐसे जीवन के ही प्रति ललक रखते हैं। मृत्यु के भय से स्वयं को दूर पाने के लिए भूत भावन परम पावन विश्वनाथ जी के चिन्तन-मनन में मग्न‍ रहते हैं। यह सब कुछ वस्तुत: विश्वनाथ जी की ही विभूति है जिसे ऐश्वर्य भाव कहा जा सकता है। देवदेव, देवाधिदेव महादेव अनादि काल से अनेकानेक रूपों में काशी में विराजमान हैं। विश्वनाथ इनका परम कल्याणकारी रूप है। काशी में इनकी कृपा से ही मनुष्य- शिवत्व प्राप्त करता है।

काशी यथार्थत: त्रिलोक से विलक्षण है। यहाँ प्रतिक्षण अखण्डं आनन्द का प्रकाश फूटता रहता है जो योगियों, ज्ञानियों, मनीषियों और अखण्ड श्रद्धाभाव से भरे श्रद्धालुओं को निरंतर आकर्षित करता है, वे आते हैं और इसी नित्य आनन्दमय शिवभाव में अपनी लोक यात्रा पूरी करते हैं। देवताओं से लेकर ऋषि-मुनि से होते हुए सन्त , फकीर सामान्य भक्तजन यहाँ तक कि अनेक विदेशीजन भी काशी के प्रकाश से स्व‍यं आलोकित हुए और लोक को भी प्रकाशित किए, इतिहास इसका साक्षी है। चाहे वह वेदों, पुराणों के रूप में मुखरित होता हो या फिर मिट्टी और पत्थरों के रूप मौन साक्ष्य बना पडा़ हो। काशी मुनष्य सभ्‍यता की अनादि काल से की गई संतुलित, संयमित तथा बुद्धिमत्तपूर्ण यात्रा की वह चरम परिणति है जहाँ कि पूर्णता का अनुभव होता है। यह अपने आप में एक वैश्विक केन्द्र है यहाँ ज्ञान विज्ञान का प्रकाश स्वयं परमेश्वर विश्व के कल्याण के लिए करते हैं विश्वनाथ बनकर, लेने वाला होना चाहिए, अपने अहंकार को छोड़कर। आदि शंकराचार्य जैसे महापुरूष इसके प्रमाण हैं।

श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यासपरिषद् ऐसी ही लोकमंगल की भावना से कार्यरत है। प्रभुविश्वनाथजी की कृपा सम्पूर्ण विश्व को निर्बाध रूप से मिले इस आकांक्षा से श्री विश्वनाथ मन्दिर से सम्बद्ध इस विवरणिका प्रकाशन का निर्णय न्यास परिषद ने किया है।

इसमें यथासम्भव प्रामाणिक विवरण ही देने का प्रयास किया गया है। यह ध्यान रखा गया है कि किसी तथ्य से किसी की भावना को ठेस न पहुचे। यह विशुद्ध रूप से एक लोकहित की दिशा में सकारात्मक प्रयास है जिसमें विश्व के सभी जन शामिल हो सकते हैं, वे विश्वहित की दृष्टि से अपना महत्वपूर्ण परामर्श दे सकते हैं।