काशी विश्वनाथ मन्दिर (इतिहास/वर्तमान)



वर्तमान मन्दिर इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई के द्वारा सन् 1780 ई0 में बनवाया गया, ऐसा उनके एतत्सम्बद्ध लेख में कहा गया है। मन्दिर का निर्माण सन् 1780 ई0 के भाद्रपदमास कृष्णापक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ-

यत्कारितं द्विजसुरात्तसपर्यया तया श्रीभारतप्रमुखसंश्रवणार्द्रचित्तया।
विश्वेश्वरस्य् रमणीयतरं सुमन्दिरं श्रीपंचमण्डपयुतं सदृशं च वेश्म ।।

मोक्षलक्ष्मीविलास मन्दिर के ही समान इस मन्दिर में पाँच मण्डप बनाने का प्रयत्न किया गया‍ किन्तु विश्वनाथजी के कोने में होने के कारण पूर्व दिशा में मण्डप नहीं बन पाया। सम्प्रति पूर्वदिशा में मन्दिर का विस्तार किया गया है। इस विस्तृत प्रांगण में दोनों ओर शालामण्डप निर्मित है ताकि दर्शनार्थी यहाँ ध्यान-पूजन आदि कर सकें। मन्दिर निर्माण के कुछ वर्षो के पश्चात् पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह के द्वारा मन्दिर के शिखरों को स्वर्ण मण्डित किया गया जिसका स्वरुप आज भी विद्यमान है। सन् 1785 ई0 में तत्कालीन प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के आदेश से उस समय के अधिकारी नवाब अली इब्राहीमखाँ ने मन्दिर के सिंहद्वार के सामने नौबतखाना (नववा। स्थानक) बनवाया। जहाँ समय-समय पर विभिन्नक वाद्यों का वादन श्री विश्वनाथ जी के पूजन के अवसर पर आज भी होता है। नौबतखाना पर स्थापित लेख द्रष्टव्य है - "यह नौबतखाना विश्वेश्वर का नबाब अजीजुल्मुल्क अली इब्राहीम खाँ ने संवत् 1842 में नवाब इमामुदौला गवर्नर जनरल अजीरूलमुल्क वारेन हेस्टिंग्स जलादतजंग के फर्मान से बनवाया।

मन्दिर के शिखर पर जहाँ तक स्वर्णमण्डन हुआ है उसके नीचे के भी भाग को स्वर्णमण्डित किए जाने का प्रयत्न वर्तमान मन्दिर व्यस्थापन-प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। /p>