मन्दिर के पूरब दिशा का विस्तार



महादेव उवाच-
काश्यां तिले तिले लिंग काश्यां तीर्थ पदे पदे।
खननं काशिभूमेस्तु दुर्घटं तेन पार्वति।।
जीर्णोद्धारं च ये कुर्यर्निःसंदेहा भवन्ति ते।
न तत्र लिंगपीड़ा स्थान्न तीर्थखननं भवेत्।।
अतो जीर्णोद्धतिः कार्या निरवद्या महाफला।
स्वयं कृतं यत्खातादि तदनेकफलप्रदम्।।
ततोऽप्यधिकधर्माणां जनकं जीर्णमुद्धतम्।
पाद्ये - जीर्णोद्धारेण वै तेषां तत्फलं द्विगुणं भवेत्। इति।
                                 (वि०सेतू पृ )

विगत 350 वर्षों में विस्तारीकरण का प्रथम कार्य सन् 2007-2008 में कराया गया है जिसके द्वारा पूर्व की ओर विस्तार करने से विश्वनाथ जी के मन्दिर को पूर्व-पश्चिम लंबा एक खुला प्रांगण मिल गया है इसी प्रांगण में श्री तारकेश्वर और उनके पूर्व श्री भुवनेश्वर का मन्दिर है। प्रांगण के दोनो ओर शालामण्ड‍प है जहाँ श्रद्धालुओं के ध्यान-मनन पूजन की सुविधा है। मन्दिर प्रशासन के लिए एक दो कक्ष के साथ इसी प्रांगण के उत्तरी दीवार से एक द्वार ज्ञानवापी की ओर खुलता है जबकि दूसरा दक्षिण दीवार के द्वारा सरस्वती फाटक के सामने वाली गली में खुलता है।