अन्तर्गृह क्षेत्र

अन्तर्गृह का महत्व विशुद्ध रूप से धार्मिक है जिसे कि वाराणसी क्षेत्र में निवास और मृत्यु के बाद होने वाले युक्तिलाभ से जोड़कर समझना चाहिए। श्रीविश्वेश्वर के अन्तर्गृह क्षेत्र एक सीमितक्षेत्र में प्रतिष्ठित उन देवता तीर्थ आदि की पूजा अर्चना से समब्द्ध है, जो कि प्रधानदेव विश्वनाथ जी के नित्यदर्शन क्रम में आते हैं। विश्वनाथ जी का अहर्निश सानिध्य, और इस सानिध्य में ही देहत्याग इस अन्तर्गह की मूलभावना में हो सकते है। इस अन्तर्गृह के बारे में कहा गया है -

गोकर्णेश: पश्चिमे पूर्वतश्च गंगामध्यमुत्तहरे भारभूत:।
ब्रह्ममेशानो दक्षिणे सम्प्रदिष्टस्तत्तु प्रोक्तं भवनं विश्वभर्तु:।।
                                                         (त्रिस्थलीसेतु पृ 101)

पूर्वतो मणिकर्णीशो ब्रह्ममेशो दक्षिणे स्थित:।
पश्चिमे चैव गोकर्णो भारभूतस्तथोत्तरे।।
                                                                                                        (त्रि0से0पृ 102)

अन्तर्गृह का क्षेत्र विश्वेश्वर मन्दिर की निश्चित परिधि बनाता है जिसकी प्रतिदिन की परिक्रमा श्रद्धालुओं को सन्तुष्टि प्रदान करने वाली है।

उपर्युक्ते क्षेत्रों के अतिरिक्त वाराणसी के कुछ और भी नाम कहे गये हैं। संक्षिप्त चर्चा से वाराणसी के इन नामों के बारे में भी सूचना मिलती है। जैसे –

त्रिकण्टक, आनन्द्वन, गौरीमुख तथा त्रिकण्टकविराजित।
यत्र विश्वतेश्वरो देव: सर्वेषामेव देहिनाम्।
ददाति तारकं ज्ञानं संसारान्मोरचकं परम्।।
काशी काशीति काशीति बहुधा संस्मरन्द्विज:।
न पश्यतीह नरकान्वर्तमानान्वयं कृतान्।।
                     (ब्र0वै0,का0र0 4/107)

वाराणसीति काशीति रूद्रावास इति स्फुटम्।
मुखाद्विनिर्गतं येषां तेषां न प्रभवेद्यम:।।
                 (स्कं0पु0, त्रि0से0, पृ088)