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इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद।।
(ऋग्वेद,मण्डयल10, सूक्तग129,मंत्र 7)

काशी और यहाँ के देवायतनों का महत्व सर्वकालिक रहा है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक यह आध्यात्मिक तथा विद्यानगरी होने के साथ-साथ सर्वतीर्थमयी तथा मोक्षदायिनी भी है। विश्व के प्राचीनतम ज्ञानभण्डार संस्कृत वाड.मय में काशी का और उसकी दिव्य विशेषताओं का निरन्तर निरूपण और वर्णन होता रहा है। वस्तुत: काशी को जानने एवं समझने के लिए संस्कृत साहित्य एक प्रमुख प्रामाणिक आधार है। संस्कृत रचनाकारों- कवियों ने काशी का जिस प्रकार वर्णन किया है उससे यहाँ के सभी पक्ष आलोकित हो उठते हैं। अर्थात् यहाँ की सभ्यता-संस्कृति अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक आदि सभी पक्षों द्वारा मनुष्य को बनाती है। पुराणादि के साथ साथ राजतरंगिणी, दशकुमारचरित आदि संस्कृत साहित्य की ऐसी अद्धितीय रचनाएं हैं जिनसे काशी का स्वर्णिम अतीत आलोकित हो उठता है। आठवीं शती के कश्मीर के राजनयिक और कवि दामोदरगुप्त ने अपनी रचना ‘कुट्टनीमतम्द्’ में तो विश्वेश्वर और उनके आसपास के परिवेश तक की चर्चा की है जो कि एक जीवंत ऐतिहासिक छवि उपस्थित करता है। इसी प्रकार दशवीं शती के महाकवि श्रीहर्ष भी अपनी महान महाकाव्यकृति ‘नैषधीयचरितम्द्’ में काशी की श्रेष्ठतम आध्यात्मिकता को दर्शाते हुए जब इसे पृथ्वी पर बसा हुआ नहीं स्वीकार करते तो उनका अभिप्राय इस नगरी को लोकोत्तर या अलौकिक सिद्ध करता है ।

वाराणसी निविशते न वसुन्धरायां
तत्र स्थितिर्मखभुजां भुवने निवासी:।